कंगाल से करोड़ो की सम्पत्ति का मालिक बना गरीब आदिवासी, 50 साल बाद यू पलटी किस्मत

कंगाल से करोड़ो की सम्पत्ति का मालिक बना गरीब आदिवासी, 50 साल बाद यू पलटी किस्मत

आज हम मध्यप्रदेश के रतलाम की एक आदिवासी परिवार की कहानी लेकर आया है। आपको बता दूँ 50 साल तक ये आदिवासी परिवार एक कच्चे मकान पर रहकर मजदूरी कर अपना परिवार पलता रहा और अचनाक ये परिवार उनके हाथ से जा चुकी 16 बीघा जमीन का मालिक बन गया। 50 साल से इस 16 बीघा जमीन को लेकर विवाद चल रहा था और एसडीएम कोर्ट के फैसले के बाद भी प्रशासन आदिवासी परिवार को इस जमीन पर कब्जा नहीं दिला पा रहा था। रतलाम जिले के मौजूदा कलेक्टर के प्रयासों से उसे अब यह जमीन आदिवासी परिवार को वापस मिल गई है जिसकी कीमत आज करीब 7 करोड़ रुपये है।

आपको बता दूँ ये कहानी किसी फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि मध्यप्रदेश के रतलाम में एक आदिवासी परिवार को 50 साल बाद मिले न्याय का सच है। यह न्याय भी वहाँ के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम के प्रयासों से उस किसान परिवार को मिल पाया। इस सराहनीय कार्य के लिए खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट कर कलेक्टर को धन्यवाद भी दिया।

आपको बता दूँ ये मामला रतलाम शहर से लगा एक गांव सांवलिया रुंडी का हैं। यहाँ के एक आदिवासी दुधा भाभर से साल 1960 में रतलाम शहर के एक व्यक्ति ने 16 बीघा ज़मीन की रजिस्ट्री करवा कर अपने नाम कर ली थी। कुछ सालों बाद दुधा भामर की मौत हो गई। उनके घर में 4 बेटे थे उसमें से एक थावरा भामर था , उनका पूरा परिवार ही काफी कम उम्र से मजदूरी कर रहा था। दुधा भामर के बेटे थावर भामर ने कुछ सालों बाद अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए अधिकारियों से मदद मांगी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने एसडीएम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। साल 1987 में उन्हें सफलता भी मिली जब न्यायालय ने थावर भामर के पक्ष में जमीन का फैसला दिया। लेकिन हुआ यूँ की इस फैसले को लेकर कभी आगे की शासकीय प्रक्रिया शुरु नहीं की गई जिसके कारण आदिवासी थावर भामर का नाम राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाया।

इस बीच उनके परिवार की हालात बद से बदतर होती गई। उसके चार भाईयों में से दो भाईयों की मौत हो गयी। इसी बीच मजदूरी करते करते थावर की उम्र भी करीब 70 साल हो गई थी। थावर कुछ दिनों पहले रतलाम के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम के पास अपनी ज़मीन के सारे कागज़ लेकर पहुंचे। कलेक्टर ने उस ज़मीन की संबंधी सारे दस्तवेज देखी और उन्होंने थावर को 10 दिन में ज़मीन पर कब्ज़ा दिलाने का आश्वासन दिया ।

थावर को शुरुआत में तो ये भी झूठा आश्वासन लगा , लेकिन ये सच नहीं था। कलेक्टर ने सात दिन बाद ही थावर को अपने ऑफिस में बुलाकर ज़मीन के कागज़ सौंप दिए । अपनी पूरी जीवन मजदूरी कर गुजरने वाले थावर भामर का परिवार आज 16 बीघा ज़मीन का मालिक हो गया है, जिसकी अनुमानित कीमत खुद कलेक्टर साहब ने 7 करोड़ रुपये बताई है।

थावर को आज अपने खेत वापस मिल गए जिसके कारण वह जमीन को हाथ जोड़ कर अपने पूर्वजों और देवी देवताओं की पूजा कर उनका धन्यवाद दे रहा है। उनके इतने दिनों बाद न्याय मिलने पर वह खुद यकीन नहि कर पा रहें हैं। सिस्टम से निराश और विश्वास खो चुका थावर आज न्यायपालिका और अधिकारियों का आभार व्यक्त करते नहीं थक रहा।

वहाँ के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने बताया कि आदिवासी जमीन को थावर के पिता के समय कोई उनसे हथिया लिया था। इसको लेकर उनका पूरा परिवार पिछले 50 साल से परेशान था। साल 1987 में एसडीएम कोर्ट ने आदिवासी थावर के पक्ष में इस जमीन का फैसला दिया था । इसके कुछ दिनों बाद कमिश्नर व राजस्व मंडल ने भी उसके पक्ष में फैसले पर ही सहमति दी, लेकिन किसी अधिकारी ने इस दौरान राजस्व में ज़मीन को लेकर थावर का नाम दर्ज नहीं किया गया। कलेक्टर साहब ने कहा, “कुछ दिन पहले ही आदिवासी थावर मेरे पास आये और अपनी ज़मीन के दस्तावेज दिखाए। हमने एसडीएम, तहसीलदार और पटवारी की टीम बनाकर पुराने फैसले और दस्तावेज के आधार पर आदिवासी परिवार का उसकी ज़मीन पर नाम दर्ज करवाया और कब्ज़ा दिलवाया।”

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