चुप सी तन्हाई में बह रहा वक्त का दरिया, होंठ तो सिले पर आंखें बयां करती रहीं फसाना

चुप सी तन्हाई में बह रहा वक्त का दरिया, होंठ तो सिले पर आंखें बयां करती रहीं फसाना

प्यार वो लगी है जो जलाए ना जले और बुझाए ना बुझे…ऐसी ही कश्मकश में सालों से रह रहे हैं रेखा और अमिताभ. वो नाम जो एक होने के लिए करीब तो आए पर मिलन मुमकिन ना हो सका. रिश्तों और समाज के ताने-बाने इनके भी आड़े आए और दोनों ने चुपचाप कदम पीछे ले लिए.

होंठ सिल लिए गए और बेजुबान आंखें प्यार का ये फसाना बखूबी बयां करती गईं. 40 सालों से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है. लेकिन जब-जब इनका नाम जहन में आता है तो ढेरों किस्से जिंदा हो जाते हैं.

फिल्मों से शुरू और फिल्मो पर ही खत्म हुआ ये ‘सिलसिला’

जब पहली बार ये ‘दो अनजाने’ मिले तब किसे कहां पता था कि इनकी किस्मत में क्या है..ये तो वक्त की धार के साथ बस बहते जा रहे थे. पहली फिल्म में दोनों की जोड़ी को तो खूब पसंद किया गया लेकिन इनके बीच कोई खास बॉन्ड नहीं बना था बल्कि अमिताभ तो रेखा की कुछ हरकतों से काफी परेशान थे.

लेकिन ऊपरवाले ने इन्हें साथ लाने की ठान ली थी लिहाजा निर्देशकों ने इन्हें साथ लाना शुरू कर दिया. एक के बाद एक इन्हें फिल्में मिलती गईं और दोनों की निगाहें भी. गंगा की सौगंध में ये साफ हो गया कि दोनों के बीच कुछ तो जरूर है.

अमिताभ पहले ही सात जन्मों के कसमें वादे खा चुके थे लिहाजा आंखों ही आंखो में शुरू हुए इस प्यार को जमाने से छिपाने लगे. गुपचुप मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया.

हक और फर्ज के आगे झुक गया प्यार

हमारे समाज की खासियत है वो ये कि यहां खुद के मतलब से ज्यादा हक और फर्ज को अहमियत दी जाती है और शायद यही वजह है कि आज भी लोगों का रिश्तों पर से विश्वास नहीं उठा है.

उसी फर्ज और हक के कारण अमिताभ को इस प्यार के रिश्ते से पांव पीछे लेने पड़े. रेखा ने भी विरोध नहीं जताया बल्कि चुप रहना स्वीकार कर लिया. इस चुप्पी भरी प्रेम कहानी का आज आलम ये है दोनों एक दूसरे के साए से भी टकरा जाए तो फसाने बनन लगते हैं.

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